जलियाँवाला बाग हत्याकांड, 104 साल पहले, आज के ही दिन, 13 अप्रैल 1919, भारत में एक नरसंहार हुआ था, जिसमें अंग्रेजों ने 25 से 30 हज़ार लोगों पर गोलियां बरसाई, जिसमे माना जाता है कि एक हजार लोगों की जान चली गई। दुनिया उस नरसंहार को जलियांवाला बाग हत्याकांड के नाम से जानती है। 

इस हत्याकांड के 21 साल साल बाद, एक भारतीय नौजवान ने अंग्रेजों के देश में घुसकर ऐसा बदला लिया जिसे आज भी हम याद करते हैं।

उस नौजवान का नाम था सरदार ऊधम सिंह। चलिए जानते हैं कि लंदन के एक हॉल में कैसे लिया गया का जलियांवाला बाग़ हत्याकांड का बदला! कैसे सरदार ऊधम सिंह ने सरेआम उस अंग्रेज़ अफसर को गोली मार दी जो हत्याकांड के समय पंजाब प्रांत का Lieutenant Governer था।

 

13 अप्रैल 1919 का दिन, बैसाखी का दिन, Rowlatt Act के खिलाफ शान्ति से प्रोटेस्ट करने अमृतसर के लोग जमा हुए, वहीँ गुरूद्वारे के पास में ही एक बगीचा था जिसका नाम था जलियांवाला बाग़। उसी समय Rowlatt act की वजह से पंजाब में बढ़ती हिंसा को रोकने के लिए सैन्य कमांडर कर्नल रेजिनाल्ड डायर ने बागडोर संभाली थी। उन्होंने भड़की हिंसा को दबाने के लिए अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया था।

फिर उन्हें यह खबर मिली कि जलियांवाला बाग़ में कुछ लोग विरोध प्रदर्शन करने के लिए इकठ्ठा हो रहे हैं। तब कर्नल डायर ने करीब शाम 5:30 बजे अपने सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग में गए और वहां से बाहर जाने वाले रास्तों को उन्होंने बंद कर दिया था। 

पंजाब का जालियाँवाला बाग जहाँ अंग्रेज जनरल डायर ने बाग़ में मौजूद 25-30 हजार लोगों पर गोलियाँ बरसाने का आदेश दे दिया और लगातार 10 मिनट तक मेरे बिना रुके अंधाधुन गोलियाँ चलती रही 

General Dyer का ये Action Rowlatt Act के विरोध को दबाने के लिए लिया गया था 

Rowlatt Act एक ऐसा काला कानून बनाया था जिसमें ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार दिया गया था कि वह किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाए अदालत में और जेल में बंद कर सकते थे।

Rowlatt Act का पूरे देश में जमकर विरोध हुआ था। इसी विरोध को दबाने के लिए general dyer ने गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया और तकरीबन 1000 से ज्यादा लोग मारे गए।

 

 

चलिए अब बात करते हैं एक ऐसे भारतीय नौजवान की जिसने 21 साल बाद जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लिया।

सरदार ऊधम सिंह भारतीय क्रांतिकारियों के साथ मिल गए और उनसे पैसे लेकर विदेश चले गए। ऊधम सिंह लंदन पहुँचते ही Michael O Dwyer को मारने की योजना पर काम करने में जुट गए। 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के कॉक्सटन हॉल में एक मीटिंग थी। वहां Michael O Dwyer भी शामिल हुए। ऊधम सिंह ने एक मोटी किताब को कुछ ऐसे काटा जिससे उसमें बन्दूक छुपाई जा सके। मौका लगते ही उन्होंने दो गोलियां Michael O Dwyer पर दाग दीं जिससे उसकी तुरंत मृत्यु हो गई। वहां से भागने की कोशिश में ऊधम सिंह पकड़े गए और इसके बाद उनके ऊपर मुकदमा चला और कोर्ट में पेशी भी हुई।

4 जून 1940 को सरदार ऊधम सिंह को Michael O Dwyer को मारने के जुर्म में दोषी दोषी घोषित किया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई।

ऊधम सिंह भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास में अमर हो गए।

1974 में ब्रिटेन ने उनके अवशेष भारत को सौंप दिए।

 

आज जलियांवाला बाग़ हत्याकांड को 104 साल हो गए हैं, यह इतिहास का बहुत कलंकित दिन है। इस हत्याकांड में मारे गए लोगों को भावपूर्ण श्रदांजलि देते हैं। दुनिया सरदार ऊधम सिंह को इस दुखद हत्याकांड का बदला लेने के लिए आज भी याद करती है।

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